प्रकृति और पुरुष क्या हैं?

प्रकृति पुरुष माया और संसार : ब्रह्म जीव और माया का संबंध

“रहिमन बात अगम्य की, कहनि-सुननि की नाहिं।
जे जानत ते कहत नहिं, कहत ते जानत नाहिं॥”

प्रकृति और पुरुष—या यूँ कहें कि अस्तित्व के बारे में कहने या जानने का प्रयास एक बचकानी हरकत ही है और कुछ नहीं।

क्योंकि जिस अस्तित्व के हम स्वयं एक छोटे-से अंश हैं, उसे पूरी तरह जानने का दावा आखिर कैसे कर सकते हैं?

वेद और उपनिषद भी जब उस परम सत्य की ओर संकेत करते हैं तो कई बार शब्दों को वहीं रोक देते हैं—“नेति, नेति”।

यानी—यह भी नहीं, वह भी नहीं।

“जे जानत ते कहत नहिं, कहत ते जानत नाहिं॥”

और अब यदि मैं स्वयं इस विषय पर कुछ कहने का दुस्साहस कर रहा हूँ तो इसका सीधा-सा अर्थ यही है कि—

मैं कुछ जानता नहीं हूँ।

कहत ते जानत नाहिं।

फिर भी प्रश्न उठता है।

और शायद प्रश्न का उठना ही इस पूरी यात्रा की शुरुआत है।

नमस्कार!

स्वयंप्रदीप पर आप सभी जिज्ञासुओं का स्वागत है।

कुछ दिनों पहले ही नवरात्रि का पर्व मनाया गया। त्यौहारों का अपना एक अलग ही सौंदर्य है। वे जीवन में उत्साह भरते हैं, मन में रंग भरते हैं और यूँ कहें कि रोजमर्रा के जीवन में जीवन का ही एक रीचार्ज कर देते हैं।

नवरात्रि भी ऐसा ही एक मनभावन पर्व है, जिसे विशेष रूप से माँ दुर्गा के शक्ति-स्वरूप से जोड़ा जाता है।

लेकिन आज के विषय “प्रकृति और पुरुष” का नवरात्रि और माँ दुर्गा से क्या संबंध है?

आइए, थोड़ा भीतर चलते हैं।


आखिर यह अस्तित्व है क्या?

जब हम अस्तित्व की बात करते हैं तो केवल अपना अस्तित्व ही अनुभव नहीं करते। हमारे साथ-साथ एक पूरा संसार भी अनुभव में आता है।

और यहीं से जिज्ञासा जन्म लेती है—

मैं इस संसार में आया हूँ, लेकिन यह संसार कहाँ से आया?

मैं इस संसार द्वारा निर्मित हूँ, लेकिन इस संसार का निर्माण कैसे हुआ?

इसका अस्तित्व कब से है?

कब तक रहेगा?

और सबसे बड़ा प्रश्न—

यह सब है ही क्यों?

मन और बुद्धि इन प्रश्नों के उत्तर खोजते-खोजते थक जाते हैं।

कुछ ग्रंथों का अध्ययन करने पर कुछ सहारा अवश्य मिलता है। कुछ उत्तर दिखाई देते हैं। कुछ दिशाएँ मिलती हैं। लेकिन थोड़ी दूर चलने के बाद वही अध्ययन भी हमें एक ऐसी सीमा पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ शब्द समाप्त होने लगते हैं और प्रश्न फिर से सामने खड़ा हो जाता है।

मेरा अस्तित्व मुझे वर्तमान में अनुभव होता है।

लेकिन भूतकाल में मैं क्या था?

कैसा था?

किनके बीच था?

कहाँ था?

कुछ भी याद नहीं।

भविष्य में क्या होगा?

यह भी पता नहीं।

तो क्या अस्तित्व केवल इतना ही है जितना अभी अनुभव हो रहा है?

या मैं पहले भी किसी रूप में था और आगे भी किसी रूप में रहूँगा?

प्रश्नों का एक पूरा समुद्र भीतर उठता है।

और फिर…

मन थक जाता है।


अस्तित्व को सरल करके देखें तो?

यदि सम्पूर्ण अस्तित्व को बहुत सरल भाषा में बाँटने का प्रयास करें तो कह सकते हैं—

अस्तित्व = सजीव + निर्जीव

लेकिन तुरंत अगला प्रश्न सामने खड़ा हो जाता है—

इन दोनों को बनाने वाला कौन?

और फिर मन एक और सरल मॉडल बनाने की कोशिश करता है—

अस्तित्व = चेतन + जड़ + वह परम आधार जिससे दोनों का अस्तित्व संभव है।

भारतीय दार्शनिक परंपराओं में इसे अलग-अलग दर्शनों ने अलग-अलग ढंग से समझाया है।

कहीं जीव, कहीं प्रकृति, कहीं पुरुष, कहीं ब्रह्म, कहीं माया जैसे शब्द सामने आते हैं।

सरल भाषा में समझें तो हमारे सामने तीन बातें दिखाई देती हैं—

  1. जड़ या प्रकृति — जो दिखाई देती है, बदलती है और अनेक रूप धारण करती है।
  2. जीव या चेतन — जो अनुभव करता है, जानता है और अपने अस्तित्व पर प्रश्न उठाता है।
  3. परम सत्य / ब्रह्म — जिसे विभिन्न दार्शनिक परंपराएँ अस्तित्व के अंतिम आधार के रूप में समझने का प्रयास करती हैं।

और यहीं से प्रकृति और पुरुष का प्रश्न हमारे सामने आता है।


तो फिर माँ दुर्गा का यहाँ क्या काम है?

अब शायद यह समझना आसान होगा कि मैंने शुरुआत में माँ दुर्गा का उल्लेख क्यों किया।

भारतीय परंपरा में प्रकृति को केवल निर्जीव पदार्थ मानकर समाप्त नहीं कर दिया गया।

विशेषकर शाक्त परंपरा में प्रकृति को शक्ति के रूप में देखा गया—वह शक्ति जिससे यह सम्पूर्ण दृश्य जगत प्रकट होता है।

इसीलिए माँ दुर्गा का रूप केवल पूजा की एक मूर्ति तक सीमित नहीं रह जाता।

वह शक्ति का प्रतीक भी बन जाता है।

वह प्रकृति है।

वह सृजन की शक्ति है।

वह परिवर्तन की शक्ति है।

वह वह शक्ति है जिसके बिना यह दिखाई देने वाला संसार अपनी वर्तमान अवस्था में दिखाई ही नहीं दे सकता।

लेकिन यहाँ से एक और अद्भुत प्रश्न जन्म लेता है—

क्या प्रकृति और उसका रचयिता दो अलग-अलग चीजें हैं?


द्वैत कहता है—दो हैं

भारतीय दर्शन में इस प्रश्न को समझने के कई मार्ग रहे हैं।

एक दृष्टि कहती है—

दो हैं।

एक है रचना और दूसरा है रचयिता।

यानी संसार अलग है और उसे बनाने वाला अलग।

इसे हम मोटे तौर पर द्वैत की दिशा में समझ सकते हैं।

लेकिन दूसरी ओर एक दृष्टि कहती है—

दो दिखाई दे रहे हैं, लेकिन मूलतः दो हैं ही नहीं।

यही अद्वैत की ओर ले जाती है।

अर्थात् रचना और रचयिता के बीच जो दूरी हमें दिखाई देती है, संभव है कि वह हमारी दृष्टि की सीमा हो।

सत्य क्या है?

यहाँ फिर वही समस्या आ जाती है।

हम कहें कैसे?

जो वर्तमान में दिखाई देता है, उसके आधार पर तो इतना निश्चित है कि रचना दिखाई देती है।

लेकिन रचयिता दिखाई नहीं देता।

प्रकृति दिखाई देती है।

पेड़ दिखाई देते हैं।

नदियाँ दिखाई देती हैं।

पर्वत दिखाई देते हैं।

आकाश दिखाई देता है।

जीवन दिखाई देता है।

हम स्वयं दिखाई देते हैं।

लेकिन वह अंतिम सत्ता, जिसके बारे में हम पूछते हैं—

“यह सब किससे और कैसे हुआ?”

वह सीधे दिखाई नहीं देती।

और शायद यहीं से मनुष्य ने ईश्वर, ब्रह्म, पुरुष, शक्ति, प्रकृति जैसे शब्दों के माध्यम से उस अगम्य को समझने का प्रयास शुरू किया।


प्रकृति आखिर है क्या?

एक बहुत सरल प्रश्न पूछते हैं—

प्रकृति किसे कहते हैं?

हम सामान्यतः अपने आसपास की चीजों को प्रकृति कहते हैं।

पेड़ प्राकृतिक हैं।

नदियाँ प्राकृतिक हैं।

पर्वत प्राकृतिक हैं।

पक्षी प्राकृतिक हैं।

जानवर प्राकृतिक हैं।

लेकिन मनुष्य?

यहाँ हम थोड़े अजीब हो जाते हैं।

एक चिड़िया द्वारा बनाया गया घोंसला देखकर हम कहते हैं—

“प्रकृति का कितना अद्भुत कमाल है!”

लेकिन मनुष्य द्वारा बनाया गया घर देखकर हम कहते हैं—

“यह मनुष्य ने बनाया है।”

मनुष्य ने सड़क बनाई।

पुल बनाया।

जहाज बनाया।

बस बनाई।

ट्रेन बनाई।

अंतरिक्ष यान बनाया।

उपग्रह बनाया।

कंप्यूटर बनाया।

और हम इन सबको मानव-निर्मित कहते हैं।

लेकिन थोड़ा रुककर देखिए।

जिस मनुष्य ने यह सब बनाया, वह स्वयं कहाँ से आया?

क्या मनुष्य प्रकृति से बाहर खड़ा कोई अलग प्राणी है?

या मनुष्य भी उसी प्रकृति का एक परिणाम है?

यदि मनुष्य प्रकृति का ही हिस्सा है, तो मनुष्य द्वारा बनाई गई वस्तुएँ भी अंततः प्रकृति की ही एक अभिव्यक्ति हुईं।

एक पेड़ से लकड़ी मिली।

लकड़ी से मेज बनी।

मेज मनुष्य ने बनाई।

लेकिन मनुष्य कहाँ से आया?

मनुष्य के शरीर के तत्व कहाँ से आए?

उसकी बुद्धि कहाँ से आई?

उसके हाथों की क्षमता कहाँ से आई?

उसकी कल्पना कहाँ से आई?

उसकी भाषा?

उसका विज्ञान?

उसकी तकनीक?

तो क्या मनुष्य द्वारा बनाई गई वस्तु को पूरी तरह प्रकृति से अलग कहा जा सकता है?

शायद नहीं।


मनुष्य प्राकृतिक है या मानव-निर्मित?

यहीं हमारा प्रश्न थोड़ा और रोचक हो जाता है।

क्या मनुष्य प्राकृतिक है?

हाँ।

क्योंकि मनुष्य प्रकृति के बाहर से नहीं आया।

उसका शरीर प्रकृति के ही तत्वों से बना है।

वह प्रकृति के नियमों के भीतर जन्म लेता है, बढ़ता है, बदलता है और अंततः उसी प्रकृति में विलीन हो जाता है।

लेकिन फिर एक दूसरी बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है—

मनुष्य प्रकृति को बदल भी सकता है।

यही मनुष्य की विशेषता है।

एक नदी अपने रास्ते पर बहती है।

मनुष्य उसके ऊपर पुल बना देता है।

पत्थर पड़ा है।

मनुष्य उससे भवन बना देता है।

धातु जमीन में है।

मनुष्य उससे मशीन बना देता है।

प्रकृति में विद्युत की शक्ति है।

मनुष्य उसे समझकर विद्युत-व्यवस्था बना देता है।

आकाश में उड़ने की क्षमता पक्षियों में दिखाई देती है।

मनुष्य ने उस प्रेरणा से विमान बना दिया।

तो क्या मनुष्य प्रकृति से अलग है?

या प्रकृति का ही ऐसा रूप है जिसने स्वयं को देखने और बदलने की क्षमता विकसित कर ली है?

शायद यही प्रश्न हमें प्रकृति और पुरुष के बहुत करीब ले जाता है।


और यहीं से “पुरुष” का प्रश्न उठता है

अब तक हमने प्रकृति को देखने की कोशिश की।

लेकिन प्रश्न यह है—

जो प्रकृति को देख रहा है, वह कौन है?

पेड़ को देखा जा सकता है।

शरीर को देखा जा सकता है।

विचारों को भी कुछ हद तक देखा जा सकता है।

भावनाओं को देखा जा सकता है।

मन की बेचैनी को भी महसूस किया जा सकता है।

लेकिन—

जो यह सब देख रहा है, उसे कौन देख रहा है?

यहीं से पुरुष शब्द का रहस्य शुरू होता है।

सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष को दो मूल तत्त्वों के रूप में समझाया गया है। वहाँ प्रकृति परिवर्तनशील है, जबकि पुरुष को चेतन, साक्षी और अपरिवर्तनशील स्वरूप में समझा जाता है।

लेकिन यहाँ भी एक सावधानी जरूरी है।

यह किसी एक सरल वाक्य में समाप्त हो जाने वाला विषय नहीं है।

क्योंकि जैसे ही हम कहते हैं—

“पुरुष यह है।”

वैसे ही प्रश्न उठता है—

“जिसे हमने यह कहा, क्या हमने उसे वास्तव में जान लिया?”

और फिर रहीम की वही पंक्ति सामने आ जाती है—

“जे जानत ते कहत नहिं, कहत ते जानत नाहिं॥”


शायद समस्या उत्तर में नहीं, प्रश्न पूछने वाले में है

हो सकता है हम अस्तित्व को इसलिए नहीं समझ पा रहे क्योंकि हम उसे बाहर खड़े होकर समझने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन हम अस्तित्व के बाहर हैं ही कहाँ?

जिस ब्रह्मांड को हम समझना चाहते हैं, उसी ब्रह्मांड का एक छोटा-सा हिस्सा हमारा शरीर है।

जिस प्रकृति को हम जानना चाहते हैं, उसी प्रकृति का एक रूप हमारा शरीर है।

जिस चेतना के बारे में हम प्रश्न पूछ रहे हैं, उसी चेतना के माध्यम से प्रश्न पूछा जा रहा है।

और शायद यही सबसे अद्भुत बात है।

अस्तित्व स्वयं को स्वयं के माध्यम से जानने का प्रयास कर रहा है।

एक मनुष्य आकाश की ओर देखता है और पूछता है—

“यह सब क्या है?”

लेकिन पूछने वाला भी उसी “सब” का हिस्सा है।


तो क्या प्रकृति और पुरुष अलग हैं?

शायद किसी दर्शन के पास इसका उत्तर है।

शायद किसी दूसरे दर्शन के पास दूसरा उत्तर है।

शायद दोनों अपने-अपने स्तर पर सही हैं।

और शायद हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम अंतिम सत्य को एक परिभाषा में बंद करना चाहते हैं।

प्रकृति को देखकर हम कहते हैं—

“यह है।”

चेतना को महसूस करके कहते हैं—

“मैं हूँ।”

और उस अंतिम सत्य को खोजते हुए पूछते हैं—

“यह सब क्यों है?”

लेकिन अंत में फिर वही मौन बचता है।

नेति। नेति।

यह भी नहीं।

वह भी नहीं।

और शायद इसी मौन के किनारे खड़े होकर रहीम मुस्कुराते हुए कहते हैं—

“रहिमन बात अगम्य की, कहनि-सुननि की नाहिं।”

क्योंकि जो वास्तव में जान गया—

शायद उसके पास कहने को कुछ बचा ही नहीं।

और जो बहुत कुछ कह रहा है—

शायद वह अभी जानने की यात्रा में ही है।

इसलिए आज मैंने जो कुछ कहा है, उसे उत्तर मत मानिए।

इसे बस एक जिज्ञासा मानिए।

एक साथ चलने का निमंत्रण।

क्योंकि स्वयंप्रदीप का उद्देश्य शायद सत्य को आपके हाथ में पकड़ा देना नहीं है।

बल्कि आपके भीतर वह प्रश्न जगा देना है—

“मैं कौन हूँ?”

और शायद अगला प्रश्न इससे भी गहरा हो—

“जिसे मैं ‘मैं’ कह रहा हूँ, वह वास्तव में कौन है?”

आपका हमसफर : स्वयंप्रदीप