नमस्कार! आप जिज्ञासु का स्वयंप्रदीप पर स्वागत है!
प्रश्न बहुत छोटा है—खोज बड़ी लंबी है, जवाब बहुत गहरा है। जिज्ञासा के साथ धैर्य और साहस की भी आवश्यकता होगी, क्योंकि हो सकता है कि हमेशा की तरह इस बार भी कोई संतोषजनक जवाब न मिल पाए।
एक बार मैं मथुरा दर्शन करने गया हुआ था। अचानक एक साधु ने मुझे अपने करीब बुलाकर पूछा—
साधु: बेटा, क्या नाम है आपका?
मैंने: प्रदीप।
दो-चार प्रश्नों के बाद उन्होंने पूछा—
साधु: आपके संसार में कौन-कौन हैं?
मैंने: मैंने कहा, संसार में तो बहुत लोग हैं—लगभग 8-9 अरब लोग।
मेरे इस जवाब पर साधु मुस्कुराए और बोले—
साधु: बेटा, वो तो भगवान की बनाई हुई दुनिया है। वे अरबों लोग भगवान के संसार के हैं। तुम्हारे अपने संसार में कौन-कौन हैं? जो तुम्हारे मन में बसे हुए हैं, जिनकी तुम चिंता करते हो, जिन्हें तुम अपना कहते हो, जिनके मरने पर तुम्हें कष्ट होगा।
फिर मैंने अपना जवाब बदलते हुए अपने परिवार के लोगों को गिनाया।
और सोचने लगा—बात तो सही है। मुझे सभी से मतलब तो रहता ही नहीं है। बस कुछ गिने-चुने लोग ही हैं मेरे संसार में।
उनके इस प्रश्न ने मुझे कुछ-कुछ जगाया और मुझे यह समझ आया कि कभी-कभी एक प्रश्न सोए हुए मनुष्य को जगा सकता है।
आगे उन साधु ने और भी प्रश्न पूछे।
उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर पूछा—
साधु: ये क्या है?
मैंने: हाथ।
साधु: किसका?
मैंने: मेरा।
फिर उन्होंने पूछा—
साधु: ये क्या है?
मैंने: मेरा पैर।
साधु: ये क्या है?
मैंने: मेरा सिर।
साधु: ये क्या है?
मैंने: मेरी नाक।
साधु: ये क्या है?
मैंने: मेरा कान।
फिर शरीर के दूसरे अंगों की ओर संकेत करते हुए—
मैंने: मेरा पेट, मेरी पीठ, मेरी उँगली… आदि।
फिर उन्होंने पूछा—
साधु: मेरा परिवार, मेरी माँ, मेरी बहन, मेरा भाई, मेरा ये, मेरा वो…?
मैंने: हाँ… हाँ।
फिर उन्होंने पूछा—
साधु: मन, बुद्धि, इच्छा—ये सब?
मैंने: हाँ, मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरी इच्छा… आदि।
उनका अगला प्रश्न बहुत मजेदार था—
साधु: जब सब तुम्हारा है, तो तुम कौन हो? जो तुम्हारा है, वो तुम तो हो नहीं सकते। तो फिर आखिर तुम कौन हो?
मैंने जवाब दिया—
मौन।
साधु फिर मुस्कुराए और बोले—
साधु: किसे खोजने आए हो मथुरा? किसका दर्शन करना है? कभी खुद से मिले हो? स्वयं की खोज की है? कहाँ हो तुम इस शरीर में?
इस शरीर और संसार की हर चीज तुम्हारी हो सकती है, तुम नहीं।
तुम कौन हो?
और फिर जब मैंने उनसे पूछा—
मैं: बताइए, मैं कौन हूँ?
तो वे खिलखिलाकर हँसने लगे और बोले—
साधु: तुम पागल हो!
जिसे यह न पता हो कि “मैं कौन हूँ?”, वह तो पागल ही हुआ ना!
मैं भी उन्हें देखकर मुस्कुराने लगा।
फिर उन्होंने कहा—
साधु: तुम कौन हो, तुम जानो। तुम्हारा काम मैं क्यों करूँ?
और फिर वे चलते बने।
लेकिन जाते-जाते वे मेरे भीतर एक प्रश्न छोड़ गए—
“मैं कौन हूँ?”
और शायद पहली बार मुझे लगा कि किसी प्रश्न का उत्तर मिल जाना ही हमेशा जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी एक प्रश्न ही मनुष्य को भीतर की ओर चलने के लिए पर्याप्त होता है।
उस दिन वे चले गए, लेकिन मुझे एक अजीब-सा ठहराव दे गए।
1. क्या मैं यह शरीर हूँ?
सबसे पहले तो यह शरीर सामने दिखाई देता है। इसलिए स्वाभाविक रूप से मन कहता है—यही मैं हूँ।
लेकिन जरा ठहरकर देखिए।
हम कहते हैं—
मेरा हाथ।
मेरा सिर।
मेरा चेहरा।
मेरी आँखें।
मेरा हृदय।
मेरा शरीर।
यहाँ एक बहुत सामान्य-सा शब्द बार-बार आ रहा है—“मेरा”।
लेकिन “मेरा” कहने वाला कौन है?
अगर हाथ मेरा है, तो क्या मैं केवल हाथ हूँ?
अगर सिर मेरा है, तो क्या मैं केवल सिर हूँ?
और अगर मैं कहता हूँ “मेरा शरीर”, तो क्या “मेरा” कहने वाला शरीर से अलग कुछ है, या यह केवल भाषा बोलने का हमारा तरीका है?
यहीं से प्रश्न थोड़ा कठिन होने लगता है।
आइए शरीर को समय के साथ देखें।
कभी यही शरीर छोटा-सा बच्चा था। फिर किशोर हुआ। फिर युवा हुआ। आज जैसा है, कल ऐसा नहीं था और आने वाले वर्षों में शायद ऐसा भी नहीं रहेगा।
चेहरा बदला, कद बदला, वजन बदला, बाल बदले, शरीर की कोशिकाएँ बदलती रहीं, शरीर की क्षमताएँ बदलती रहीं।
लेकिन इस पूरी यात्रा में एक “मैं” ऐसा भी है जिसे हम अपने अनुभव में लगातार जोड़ते रहे—“मैं बच्चा था”, “मैं बड़ा हुआ”, “मैं अब यहाँ हूँ।”
तो क्या बदलते हुए शरीर को ही उस “मैं” का पूरा नाम दे देना पर्याप्त है?
या फिर प्रश्न अभी बाकी है?
2. क्या मैं मेरा मन हूँ?
अच्छा, यदि शरीर के बाद हम भीतर की ओर देखें तो सबसे पहले मन दिखाई देता है।
हम कितनी सहजता से कहते हैं—
मेरा मन खुश है।
मेरा मन उदास है।
मेरा मन परेशान है।
मेरा मन आज शांत है।
मेरा मन यह चाहता है।
मेरा मन वह नहीं चाहता।
लेकिन कभी आपने इस सामान्य-से वाक्य पर गंभीरता से ध्यान दिया है—
“मेरा मन”?
जब मैं कहता हूँ “मेरा मन अशांत है”, तो अशांति को पहचान कौन रहा है?
जब मैं कहता हूँ “मेरा मन आज बहुत खुश है”, तो उस खुशी को जान कौन रहा है?
और जब मैं कहता हूँ—
“मेरा मन मेरे नियंत्रण में नहीं है”,
तो फिर मन को नियंत्रित करने की कोशिश कौन कर रहा है?
यहाँ एक और विचित्र बात है।
सुबह मेरा मन कुछ चाहता है और शाम तक वही मन कुछ और चाहने लगता है। कभी किसी व्यक्ति से बहुत प्रेम होता है, कभी उसी से नाराज़गी। कभी किसी काम को करने की तीव्र इच्छा होती है, कुछ समय बाद वही काम बोझ लगने लगता है।
यदि मन की अवस्थाएँ इतनी तेजी से बदलती रहती हैं, तो क्या हर बदलती हुई अवस्था को ही “मैं” कहना पर्याप्त है?
या मन के बदलने को जानने वाला भी कोई प्रश्न है?
3. क्या मैं मेरे विचार हूँ?
अब मन के भीतर उठते विचारों को देखिए।
एक विचार आया।
कुछ देर रहा।
फिर दूसरा विचार आ गया।
कभी भविष्य की चिंता, कभी अतीत की स्मृति, कभी किसी व्यक्ति की याद, कभी किसी घटना का डर, कभी कोई योजना, कभी कोई कल्पना।
एक ही दिन में न जाने कितने विचार आते-जाते हैं।
और मजेदार बात यह है कि हम कहते हैं—
“मेरे मन में यह विचार आया।”
फिर कुछ देर बाद—
“मेरा विचार बदल गया।”
तो जरा रुकिए।
अगर विचार मेरा है, तो क्या मैं केवल विचार हूँ?
आज मेरा विचार कुछ है।
कल वही विचार बदल सकता है।
कभी हम अपने पुराने विचारों को देखकर खुद कहते हैं—
“मैं तब ऐसा सोचता था, अब ऐसा नहीं सोचता।”
तो उस पुराने विचार को पहचानने वाला कौन है?
क्या “मैं” भी विचार के साथ बदल गया, या विचार बदलने का अनुभव किसी और स्तर पर हो रहा है?
यहाँ भी जल्दी से निष्कर्ष निकाल लेना शायद उचित नहीं होगा।
बस एक प्रश्न रखिए—
जो विचार मेरे भीतर आते-जाते हैं, क्या उन सभी को मिलाकर ही “मैं” कहा जा सकता है?
4. क्या मैं मेरी इच्छाएँ हूँ?
अब एक और चीज़ पकड़कर देखते हैं—इच्छा।
हम कहते हैं—
मेरी इच्छा है।
मेरी पसंद है।
मुझे यह चाहिए।
मुझे यह नहीं चाहिए।
मेरी इच्छा बदल गई।
लेकिन इच्छा भी कितनी अजीब चीज़ है।
एक समय जिस चीज़ के लिए हम बेचैन थे, उसे पा लेने के बाद कुछ समय में वही सामान्य लगने लगती है।
बचपन की इच्छाएँ बदल गईं।
युवावस्था की इच्छाएँ बदल गईं।
आज की इच्छाएँ भी शायद कुछ वर्षों बाद बदल जाएँगी।
कभी हम कहते हैं—
“मैं यह जरूर करूँगा।”
और कुछ समय बाद कहते हैं—
“अब मेरा मन नहीं है।”
तो फिर प्रश्न उठता है—
अगर मेरी इच्छा बदल गई, तो क्या मैं भी बदल गया?
या फिर वह कौन है जो यह पहचान पा रहा है कि—
“मेरी इच्छा बदल गई है”?
यह प्रश्न छोटा है, लेकिन शायद हमारी पूरी पहचान को हिला सकता है।
5. क्या मैं मेरा नाम और पहचान हूँ?
अब शायद सबसे आसान उत्तर आएगा—
“मैं प्रदीप हूँ।”
लेकिन प्रदीप नाम मैंने स्वयं तो चुना नहीं था।
जन्म के बाद किसी ने मुझे यह नाम दिया।
यदि मेरा नाम कुछ और रख दिया जाता, तो क्या मेरा “मैं” भी बदल जाता?
फिर मेरी दूसरी पहचानें देखिए।
मैं किसी का बेटा हूँ।
किसी का भाई हूँ।
किसी का मित्र हूँ।
समाज में मेरी एक भूमिका है।
मेरे पास कोई काम है, कोई पेशा है, कुछ उपलब्धियाँ हैं, कुछ असफलताएँ हैं, कुछ संबंध हैं, कुछ विचार हैं।
लेकिन इनमें से कितनी चीजें ऐसी हैं जिन्हें समय ने बदला नहीं है?
परिवार बदल सकता है।
पेशा बदल सकता है।
शहर बदल सकता है।
आर्थिक स्थिति बदल सकती है।
रिश्ते बन सकते हैं और टूट सकते हैं।
उपलब्धियाँ आ सकती हैं और चली जा सकती हैं।
यहाँ तक कि मेरे अपने विचार और मान्यताएँ भी बदल सकती हैं।
तो फिर—
इन बदलती हुई पहचानों के पीछे वह कौन है जिसे मैं लगातार “मैं” कहता आया हूँ?
और अगर मेरी सारी सामाजिक पहचानें मुझसे एक-एक करके हटा दी जाएँ—
तो क्या कुछ ऐसा बचेगा जिसे मैं फिर भी “मैं” कह सकूँ?
6. तो फिर आखिर मैं कौन हूँ?
अब तक हमने शरीर को देखा।
मन को देखा।
विचारों को देखा।
इच्छाओं को देखा।
नाम और पहचान को देखा।
हर जगह एक अजीब-सा शब्द बार-बार हमारे साथ चलता रहा—
“मेरा।”
मेरा शरीर।
मेरा मन।
मेरे विचार।
मेरी इच्छा।
मेरा परिवार।
मेरा नाम।
मेरी पहचान।
लेकिन इन सबके बीच वह कौन है जो बार-बार कह रहा है—
“मेरा”?
यहीं आकर प्रश्न अपनी असली गहराई पकड़ता है।
शायद शुरुआत में प्रश्न था—
“मैं कौन हूँ?”
लेकिन अब प्रश्न थोड़ा बदल गया है—
“जिसे मैं ‘मैं’ कह रहा हूँ, वह वास्तव में क्या है?”
और शायद इससे भी कठिन प्रश्न है—
क्या मैं वास्तव में स्वयं को जानता हूँ, या अब तक अपने बारे में मिली हुई पहचानों, स्मृतियों, संबंधों, विचारों और धारणाओं को ही “मैं” मानता आया हूँ?
यहाँ मैं आपको कोई उत्तर नहीं देना चाहता।
क्योंकि यदि मैंने कोई उत्तर कह दिया और आपने उसे केवल इसलिए सत्य मान लिया कि मैंने कह दिया, तो फिर आपकी खोज कहाँ रही?
इसलिए फिलहाल उत्तर से अधिक महत्वपूर्ण है—
प्रश्न को जीवित रखना।
अपने भीतर इस प्रश्न को लेकर चलना।
अपने शरीर को देखना।
अपने मन को देखना।
अपने विचारों को देखना।
अपनी इच्छाओं को देखना।
अपनी पहचान को देखना।
और बार-बार स्वयं से पूछना—
“इन सबके पीछे मैं कौन हूँ?”
शायद इस यात्रा में सबसे ईमानदार शुरुआत यही है कि हम यह स्वीकार करें—
हमें अपने बारे में बहुत कुछ पता है, लेकिन क्या हम स्वयं को जानते हैं?
और यदि नहीं जानते—
तो फिर “मैं कौन हूँ?” से बड़ी खोज हमारे लिए और क्या हो सकती है?
आज जब मैं यह लेख तैयार कर रहा हूँ, उन साधु से मेरी उस मुलाकात और चर्चा को लगभग 7 वर्ष हो चुके हैं। लेकिन मेरी खोज की यात्रा अभी भी चल रही है और शायद चलती ही रहेगी।
यदि आज मैं आपके इस प्रश्न का कोई निश्चित जवाब दे दूँ कि “मैं कौन हूँ?”, तो शायद यह आपके साथ किया गया अन्याय होगा। बल्कि मेरे लिए यह एक अपराध और एक सच्चा झूठ भी हो सकता है।
क्योंकि जो मैंने स्वयं नहीं जाना, उसे मैं आपके सामने सत्य बनाकर कैसे रख सकता हूँ?
आपकी यात्रा आपको ही करनी होगी।
प्रश्न आपका है, खोज आपकी है और निश्चित ही उत्तर भी आपको ही खोजना होगा।
“तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।”
धन्यवाद!
आपका हमसफर,
स्वयंप्रदीप 🪔
