चरम लक्ष्य

मनुष्य का चरम लक्ष्य क्या है ? स्वयंप्रदीप

एक बार मैं और मेरे कुछ मित्र बात करते-करते :

पहले मित्र से वार्ता

मैं : भाई, तुम्हारा चरम लक्ष्य क्या है?

पहला मित्र : स्वर्ग।

मैं : क्यों? स्वर्ग क्यों?

पहला मित्र : क्योंकि अच्छे कर्मों का फल स्वर्ग होता है, वहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ हैं – वहाँ न भूख सताती है, न प्यास और न ही उम्र की सीमा है, नित्य यौवन।

मैं : और?

पहला मित्र : और तो और, इन सबके अलावा वहाँ सोमरस का भंडार है, पृथ्वी के सोमरस से कहीं अधिक स्वादिष्ट।

मैं : और?

पहला मित्र : इससे भी आगे अप्सराएँ, एक नहीं बहुत सी, थोड़ी-मोड़ी सुंदर नहीं, असीम सुंदरतायुक्त।

मैं : और?

पहला मित्र : लंबी उम्र, दिव्य शक्तियाँ, अरे, वो सब जिसकी हम कल्पना करते हैं।

मैं : Hmm…. तो पृथ्वी में इन्हीं चीजों से दूर रहकर स्वर्ग में इन्हीं चीजों को अधिक मात्रा में पाने की चाह परम लक्ष्य है?

यहाँ बाल ब्रह्मचारी रहकर वहाँ अप्सराएँ?

यहाँ मदिरा त्यागकर वहाँ असीम सोमरस?

यहाँ के मिले हुए वास्तविक सुख-वैभव त्यागकर वहाँ की कल्पनी सुख?

क्या यही तुम्हारा चरम और परम लक्ष्य है?

क्या यहाँ वही चीजें कम मात्रा में मिलना पाप और वहाँ अधिक मात्रा में मिलना पुण्य का फल है?

पहला मित्र : अभी गहन विचार में डूबे हुए थे, तो मैं सोचा अगले मित्र से वार्ता किया जाए।

दूसरे मित्र से वार्ता

मैं : भाई, तुम्हारा (या तुम्हारे विचार से) चरम लक्ष्य क्या है?

भाई ने पहले के साथ वार्ता सुनी थी और थोड़ा आगे के स्तर का भी था, उन्होंने उत्तर दिया :

दूसरा मित्र : भाई, स्वर्ग तो नित्य नहीं है। वहाँ से कर्मफल भोगने के बाद क्या पता कौन-सी योनि में जन्म लेना पड़े? इसलिए मुझे तो मुक्ति चाहिए, “वैकुंठ” या “गोलोकधाम” जाना है।

मैं : वहाँ का क्या दृश्य है, मित्र?

दूसरा मित्र : वहाँ नित्य भगवान का सान्निध्य होगा, माया से दूर, माया तो वहाँ फटकती भी नहीं। मुक्ति के बाद जन्म-मृत्यु का चक्र भी खत्म।

मैं : भाई, जय और विजय की कहानी सुनी है? वो सिर्फ मुक्ति प्राप्त नहीं थे, अपितु भगवान के नित्य पार्षद थे, लेकिन उन्हें क्रोध और अहंकार (माया) के कारण श्राप मिला – आपने पक्का किया है कि वहाँ माया नहीं फटकती?

दूसरा मित्र : नहीं भाई, वो तो प्रभु की इच्छा से हुई एक लीला मात्र थी, अवतार ग्रहण के लिए।

मैं : अच्छा! तब ठीक है।

अब दोनों मित्रों से एक साथ वार्ता करते हुए :

मैं : यदि स्वर्ग और नरक से वो सारी सुविधाएँ हटा दी जाएँ, तो क्या तुम वहाँ जाना चाहोगे? क्या तब भी तुम्हारा चरम लक्ष्य वही होंगे?

दोनों मित्र : अर्थात? कहना क्या चाहते हो?

मैं : मेरा कहने का मतलब है – यदि भगवान ने वैकुंठ में तापमान बढ़ा दिया, वहाँ की जमीन पर काँटे बिछवा दिए, वही सब बीमारियाँ जो यहाँ सताती हैं : भूख, थकावट, आदि कष्ट और ठीक वैसे ही स्वर्ग से सुख-सुविधा हटा दी जाए, अप्सराएँ और सोमरस हटा दिए जाएँ, तो क्या फिर भी तुम वहाँ जाना चाहोगे?

दोनों मित्र : कुछ देर शांत रहने के बाद – फिर वहाँ जाने का मतलब ही क्या रह जाएगा?

मैं : वहाँ अब भी वही सब देवी-देवता हैं, और वैकुंठ में अभी भी श्री नारायण हैं। क्या अब उनका सान्निध्य पाना चाहोगे?

मित्र : क्या कह रहे हो, यार, ऐसा कैसे हो सकता है?

मैं : ऐसा नारद जी के साथ हो चुका है, कथा तो सुना होगा? कैसे नारद जी को माया का दृश्य दिखाया था?

वैकुंठ कहाँ है ? वैकुंठ कैसे प्राप्त करें ?

मित्र : हाँ, सुना तो है कि नारद जी को कई वर्षों का माया का अनुभव कराया था, असीम कष्ट और भय का।

मैं : तो बस, फिर ऐसा संभव है कि वैकुंठ में आपको ये सभी कष्ट के साथ भगवान के सान्निध्य में रहने के लिए कहा जाए, तो क्या अब भी तुम्हारा चरम और परम लक्ष्य वही होगा?

मित्र : यार, तुम धर्म-संकट में डाल दिए।

चलो, ये तो मित्रों की बात हुई, क्या तुम इस हाल में वैकुंठ जाना चाहोगे, जब वहाँ काँटे और अंगारे बिछे हों? कष्ट सभी हों और भगवान का सान्निध्य हो?

कुछ लोग कहने को हाँ कह देंगे, लेकिन अंदर से ना ही बोल रहे होंगे।

अब प्रश्न ये है : चरम लक्ष्य मुक्ति और मुक्ति के बाद वैकुंठ क्यों चाहते हैं लोग?

या प्रश्न यह भी हो सकता है : भगवद्प्राप्ति क्यों?

क्योंकि हमें यह सुनने को मिला है कि मुक्ति या भगवान की प्राप्ति से सभी कष्ट हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे (ये तो बहुत सरल सी बात है)।

हाँ, सही है, लेकिन फिर चरम लक्ष्य भगवान की प्राप्ति नहीं हुई – अपितु भगवान की प्राप्ति से जो हमें कष्टों से मुक्ति मिल रही है, वो हुई न चरम लक्ष्य।

और आगे चलो : मुक्ति भी क्यों चाहिए कष्टों से?

क्योंकि दुःख से मुक्ति मिलने पर “आनंद की प्राप्ति” होगी।

बस, बस, बस, यहीं रुको……….

आनंद की प्राप्ति : चरम लक्ष्य

चरम लक्ष्य तो आनंदप्राप्ति है।

बाकी सब तो इसके लिए किया जा रहा है। यदि इसी शरीर से, इसी जीवन में अनंत आनंद मिल जाए, अनंत समय के लिए, तो फिर क्यों स्वर्ग और वैकुंठ? और कैसा सान्निध्य चाहिए?

वास्तविक सान्निध्य तो आनंद की चाहिए और हमें यही मिलता हुआ नजर आता है, कुछ हद तक स्वर्ग में और अनंत मात्रा में, अनंत समय के लिए वैकुंठ या गोलोकधाम वगैरह में।

वेद और उपनिषद भी तो यही कहते हैं :

आनंदों ब्रह्मेति व्यजानात्

और आज के इस लेख में मैं यह नहीं कहूँगा कि ये मेरे विचार हैं, सावधान रहो। ये तो सबके विचार हैं, आपका भी, ऋषियों का भी, तपस्वियों का भी, देवताओं का भी, राक्षसों का भी, कीट-पतंगों का भी, गधे का भी, उल्लू का भी, हंस का भी, पुराणों का भी, वेदों का भी, उपनिषदों का भी और स्वयं श्रीभगवान का भी।

आनंद की भक्ति सब करते हैं!

प्रतिक्षण-प्रतिपल बस आनंद ही तो चाहिए सबको।

आस्तिक अपनी आस्तिकता से आनंद चाहता है।

नास्तिक अपने तरीके से आनंद चाहता है।

ज्ञानी अपने तरीके से आनंद की खोज कर रहे हैं।

अज्ञानी अपने तरीके से कर रहे हैं आनंद की खोज।

अन्य प्राणी भी अपने-अपने आनंद की यात्रा में हैं।

अब कुछ ग्रंथों की बात करते हैं :

तैत्तिरीय उपनिषद के भृगु वल्ली (तृतीय अध्याय) :

आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। सैषा भार्गवी वारुणी विद्या। परमे व्योमन्प्रतिष्ठिता। स य एवं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ंअहान्‌ कीर्त्या॥

वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड (सर्ग 37, श्लोक 32) से :

तत्त्वया पुत्रगर्धिन्या पुत्रस्य कृतमप्रियम् ।
लोके हि स न विद्येत यो न राममनुव्रतः ॥

संसार में ऐसा कोई भी प्राणी (जीव) विद्यमान नहीं है, जो श्री राम का अनुगामी या भक्त न हो।

लेकिन संसार में तो दूर की बात, यहीं भारत में ही बहुत से हैं जो राम को या तो नहीं मानते या फिर कम से कम उनकी भक्ति तो नहीं करते, फिर? ऐसा क्यों कहा होगा?

चलो समझने का प्रयास करते हैं : राम कहो या कृष्ण या कोई और ही नाम ले लो, किसी अन्य भाषा में भगवान तो भगवान ही रहेंगे और अपने मूल रूप में रहेंगे (नित्य नवरूप होता है उनका क्योंकि प्रकृति के परिवर्तन के नियम को वे भी नहीं बदल सकते – और मजे की बात तो यह है कि यदि वे ऐसा कर भी लेते हैं तो प्रकृति के परिवर्तन के नियम का ही पालन कर रहे होंगे, इस नियम में परिवर्तन करके) और यहाँ राम या कृष्ण कुछ और नहीं :

सच्चिदानंद : सत्, चित्त और आनंद ही तो हैं। वेदांतों में, ग्रंथों में और पुराणों में भी ईश्वर की जिन तीन शक्तियों के बारे में कहा गया है, वे यही : सत्, चित्त और आनंद हैं।

आनंद उनका अपना स्वरूप है, फिर चाहे राम कहो या कृष्ण या कहो हरि या नारायण या शिव या राधा या सीता।

सुना तो होगा ही : नन्द घर आनंद भयो।

अब क्या?

तो क्या आनंद ही हमारा परम और चरम और प्रथम और अंतिम लक्ष्य है?

हाँ, एकदम सही समझे।

तो क्या आनंद के लिए कुछ भी करें, सही है? जैसे राक्षस भी आनंद के लिए ही तो दूसरों को कष्ट देते हैं?

नहीं, यह कहना सही नहीं होगा, क्योंकि ऐसा करने से हम किसी और के आनंद में बाधा उत्पन्न कर रहे होंगे। हमें अपने लक्ष्य आनंद के लिए कर्म करने की स्वतंत्रता है, लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए : दूसरों के आनंद में बाधा उत्पन्न करना कष्टकारी होगा – आनंददायी नहीं।


तो फिर एक बार स्वयं से पूछिए —

मुझे वास्तव में चाहिए क्या?

स्वर्ग?

मुक्ति?

वैकुंठ?

भगवान का सान्निध्य?

दुःख से मुक्ति?

या इन सबके पीछे छिपी हुई वही एक चाह — आनंद?

और यदि आनंद ही मेरी सबसे गहरी चाह है, तो फिर अगला प्रश्न और भी गहरा है —

वह आनंद कहाँ है?

क्या वह किसी स्थान पर मिलेगा?

क्या वह किसी लोक में मिलेगा?

क्या वह मृत्यु के बाद मिलेगा?

या जिसे पाने के लिए मैं पूरी दुनिया में भटक रहा हूँ,
वह कहीं बाहर नहीं, स्वयं में ही विद्यमान है?

शायद यहीं से स्वयं की खोज शुरू होती है।

इसी के साथ आप सभी जिज्ञासुओं का सहृदय धन्यवाद!

आपका अपना हमसफर —
स्वयंप्रदीप