कभी आपने इस बात पर ध्यान दिया है कि जब हम रात में सोते हैं, तब हमारी आँखें बंद होती हैं। बाहर की दुनिया से उनका संपर्क लगभग रुक जाता है। लेकिन इसी अवस्था में हम सपने देखते हैं।
कभी सपने में पहाड़ दिखाई देते हैं, कभी समुद्र, कभी कोई परिचित चेहरा, तो कभी ऐसी जगहें भी दिखाई देती हैं जिन्हें हमने शायद पहले कभी देखा ही नहीं होता।
सपने में हम चलते हैं, दौड़ते हैं, बातें करते हैं, हँसते हैं और कभी-कभी डरकर जाग भी जाते हैं।
लेकिन यहाँ एक छोटा-सा प्रश्न उठता है—
जब सपने में आँखें बाहर की दुनिया को नहीं देख रही होतीं, तब सपने के दृश्य दिखाई किसे देते हैं?
क्या सपने में भी हमारी आँखें देखती हैं?
दिन में जब हम किसी फूल को देखते हैं, तो सामान्यतः हम कहते हैं कि हमारी आँखों ने फूल देखा।
लेकिन रात में जब आँखें बंद होती हैं और सपने में वही फूल दिखाई देता है, तब क्या वास्तव में हमारी भौतिक आँखें उसे देख रही होती हैं?
आप अपने अनुभव को याद कीजिए।
कभी आपने सपने में किसी ऐसे व्यक्ति को देखा होगा जो उस समय आपके आसपास मौजूद नहीं था। कभी किसी पुराने घर में पहुँच गए होंगे, कभी बचपन की किसी घटना को फिर से जी लिया होगा।
उस समय आपको सपना केवल एक विचार की तरह नहीं लगता। कई बार वह इतना वास्तविक अनुभव होता है कि जागने के बाद भी कुछ देर तक उसका प्रभाव बना रहता है।
तो फिर प्रश्न है—
आँखें बंद होने पर भी दृश्य का अनुभव कैसे हो रहा था?
क्या देखने का अनुभव केवल आँखों पर निर्भर है?
हम सामान्य जीवन में देखने और आँखों को लगभग एक ही बात मान लेते हैं।
लेकिन सपना हमें इस धारणा पर थोड़ा ठहरकर विचार करने का अवसर देता है।
सपने में दिखाई देने वाले दृश्य बाहर मौजूद वस्तुओं की तरह नहीं होते। वे हमारे मस्तिष्क की गतिविधियों और स्मृतियों, भावनाओं तथा कल्पनाओं से जुड़े अनुभव होते हैं।
आधुनिक विज्ञान भी बताता है कि नींद के दौरान मस्तिष्क सक्रिय रहता है और विशेषकर REM नींद में जीवंत सपने देखने की संभावना अधिक होती है।
इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि सपने में हमारी आँखें किसी अदृश्य संसार को देख रही होती हैं।
लेकिन एक प्रश्न फिर भी बचता है—
जब मस्तिष्क में स्वप्न का अनुभव बन रहा होता है, तब उस अनुभव के होने का अहसास किसे हो रहा होता है?
सपने में दिखाई देने वाला संसार और उसे अनुभव करने वाला कौन?
मान लीजिए, आप सपने में किसी नदी के किनारे खड़े हैं।
आपको नदी दिखाई दे रही है। पानी की आवाज सुनाई दे रही है। शायद ठंडी हवा का अनुभव भी हो रहा है।
उस समय सपने का पूरा संसार आपके अनुभव में उपस्थित है।
फिर अचानक आपकी नींद खुल जाती है।
अब नदी नहीं है, वह किनारा नहीं है और सपने में दिखाई देने वाले लोग भी आसपास नहीं हैं।
लेकिन आप कहते हैं—
मैंने सपना देखा था।
यहाँ एक दिलचस्प बात है।
सपने के भीतर आप स्वयं को उस सपने के संसार का हिस्सा अनुभव कर रहे थे। जागने के बाद आप उसी अनुभव को याद कर रहे हैं।
तो क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की है कि स्वप्न के दौरान अनुभव का स्वरूप क्या था और जागने के बाद उस अनुभव को याद करने का स्वरूप क्या है?
क्या दोनों अवस्थाओं में अनुभव करने की प्रक्रिया एक जैसी है?
या उनमें कोई अंतर है जिसे समझना अभी बाकी है?
क्या सपने देखने वाला और सपने का पात्र एक ही हैं?
एक और उदाहरण लेते हैं।
कभी आपने सपना देखा होगा कि आप किसी ऊँची इमारत से गिर रहे हैं। कभी ऐसा भी हुआ होगा कि सपने में आप किसी दूसरे व्यक्ति को देख रहे थे, उससे बातचीत कर रहे थे या उसके साथ कोई घटना घटते देख रहे थे।
सपने में आप स्वयं भी एक पात्र होते हैं और आपके सामने पूरा दृश्य भी उपस्थित होता है।
लेकिन जागने के बाद आप कहते हैं कि वह पूरा सपना मैंने देखा था।
यहाँ विचार करने योग्य प्रश्न है—
क्या सपने में दिखाई देने वाला आपका रूप ही आपका पूरा अनुभव करने वाला स्वरूप है?
या सपने के दृश्य, सपने का पात्र और उस पूरे अनुभव का होना—इन सबके बीच कोई ऐसा संबंध है जिसे हम अभी ठीक से समझ नहीं पाए हैं?
इस प्रश्न का उत्तर जल्दबाजी में देने की आवश्यकता नहीं है।
बस अपने अनुभव को ध्यान से देखना पर्याप्त है।
क्या स्वप्न हमें चेतना के बारे में कुछ सोचने का अवसर देता है?
भारतीय दर्शन में चेतना, मन, स्वप्न और साक्षी जैसे विषयों पर बहुत गहरा विचार किया गया है।
माण्डूक्य उपनिषद में जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—चेतना की तीन अवस्थाओं का वर्णन मिलता है।
विशेष रूप से स्वप्न अवस्था को समझने का प्रयास हमें यह देखने का अवसर देता है कि अनुभव केवल बाहरी इंद्रिय-संपर्क तक सीमित नहीं दिखाई देता।
हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं कि स्वप्न में दिखाई देने वाला प्रत्येक दृश्य किसी अलग आध्यात्मिक संसार का प्रमाण है।
स्वप्न को मन और मस्तिष्क की गतिविधियों के रूप में समझने के वैज्ञानिक प्रयास भी हैं। वहीं भारतीय दर्शन इसे आत्मचिंतन और चेतना की प्रकृति पर विचार करने का एक माध्यम मानता है।
दोनों दृष्टियों के बीच प्रश्न पूछने और समझने की पर्याप्त गुंजाइश है।
एक छोटा-सा प्रयोग: अपने सपने को याद कीजिए
आज या कभी भी जब आपकी नींद खुले और आपको कोई सपना याद हो, तो कुछ क्षण रुककर इन प्रश्नों पर विचार कीजिए—
- सपने में दृश्य किस प्रकार उपस्थित थे?
- क्या उस समय आपको पता था कि आप सपना देख रहे हैं?
- क्या सपने में आपका शरीर और जागने के बाद आपका शरीर एक जैसा अनुभव हो रहा था?
- सपने के दृश्य समाप्त हो गए, लेकिन उनकी स्मृति कैसे बनी रही?
- क्या आपने कभी यह जानने की जिज्ञासा की कि सपने का अनुभव होने का अर्थ आखिर क्या है?
इन प्रश्नों के उत्तर किसी पुस्तक से तुरंत लेने की आवश्यकता नहीं है।
पहले अपने अनुभव को देखिए। फिर विज्ञान, दर्शन और अपने विवेक की सहायता से उसे समझने का प्रयास कीजिए।
तो आखिर वह कौन है जो बिना आँख के सपने देखता है?
अब हम अपने मूल प्रश्न पर लौटते हैं।
जो बिना आँख के सपने देखता है, वह कौन है?
वैज्ञानिक दृष्टि से सपने मस्तिष्क की नींद के दौरान होने वाली गतिविधियों से जुड़े अनुभव हैं। लेकिन इन अनुभवों का होना और उनका अनुभव किए जाने का प्रश्न हमें चेतना की प्रकृति पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
क्या हम केवल वही हैं जिसे सपने में देखा जा रहा है?
क्या हम केवल सपने के दृश्य हैं?
या अपने अनुभव को समझने के लिए हमें ‘देखने’, ‘दिखाई देने’ और ‘अनुभव होने’ के बीच के अंतर को और गहराई से समझना होगा?
शायद इस प्रश्न का सबसे सुंदर पहलू यही है कि इसका आरंभ किसी दूर की कल्पना से नहीं, बल्कि हमारे अपने रोजमर्रा के अनुभव से होता है।
आँखें बंद कीजिए, अपने किसी पुराने सपने को याद कीजिए और एक क्षण ठहरकर पूछिए—
सपना तो बदल गया, दृश्य भी समाप्त हो गए; लेकिन उस सपने को देखने का अनुभव आखिर था क्या?
हो सकता है, इस प्रश्न की गहराई में उतरना ही स्वयं को समझने की एक नई यात्रा का आरंभ हो।
— स्वयंप्रदीप
