अक्सर हम अपने जीवन के हर सत्य को अपनी आँखों, कानों, इंद्रियों और बुद्धि के माध्यम से ही जानने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या हमारी सीमित इंद्रियाँ उस परम सत्य को जान सकती हैं, जो स्वयं इंद्रियों, मन और बुद्धि का आधार है?
क्या जानने वाले को भी उसी प्रकार जाना जा सकता है, जिस प्रकार हम संसार की अन्य वस्तुओं को जानते हैं?
आइए, इस गहरे प्रश्न को कुछ सरल उदाहरणों के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।
1. इंद्रियाँ किसे जानती हैं? (दृश्य और नाम-रूप का जगत)
इस संसार में हमारी इंद्रियाँ अपने-अपने विषयों को जानती हैं। आँखें रूप और रंग को देखती हैं, कान ध्वनि सुनते हैं, नाक सुगंध ग्रहण करती है, जीभ स्वाद जानती है और त्वचा स्पर्श का अनुभव करती है।
उदाहरण के लिए, आपके सामने एक सुंदर फूल खिला हुआ है।
उसका एक रंग है, एक आकार है और एक निश्चित रूप है।
आपकी आँखें उस फूल को देख लेती हैं। आपकी उँगलियाँ उसकी पंखुड़ियों को छूकर उसकी कोमलता का अनुभव कर लेती हैं। आपकी नाक उसकी सुगंध का अनुभव करती है।
इस प्रकार फूल हमारी इंद्रियों के लिए एक ज्ञेय विषय है।
यह पूरा संसार, हमारा शरीर और बाहर चमकता हुआ सूर्य भी हमारे अनुभव के विषय हैं। हम इन्हें इंद्रियों, मन और बुद्धि के माध्यम से जानते हैं।
लेकिन यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है।
क्या जानने वाला भी जानने योग्य वस्तुओं की ही श्रेणी में आता है?
2. इंद्रियातीत सत्ता को इंद्रियाँ क्यों नहीं जान सकतीं?
आइए, फूल के ही उदाहरण को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं।
फूल की सुगंध को आपकी आँखें नहीं देख सकतीं, लेकिन आपकी नाक उसका अनुभव कर सकती है।
इससे स्पष्ट होता है कि प्रत्येक इंद्रिय की अपनी एक सीमा है। आँखों का विषय रूप है, कानों का विषय ध्वनि है और नाक का विषय गंध है।
अब एक और उदाहरण देखिए।
आँख संसार की अनगिनत वस्तुओं को देख सकती है, लेकिन क्या आँख स्वयं को सीधे देख सकती है?
नहीं! स्वयं आँख को देखने के लिए भी हमें किसी दूसरे माध्यम, जैसे दर्पण की आवश्यकता पड़ती है।
अब विचार कीजिए कि जो सत्ता इन आँखों को देखने की क्षमता देती है, जो कानों के सुनने, मन के सोचने और बुद्धि के समझने का आधार है, उसे ये सीमित उपकरण किस प्रकार अपने सामने किसी वस्तु की तरह प्रस्तुत कर सकते हैं?
हमारे भीतर जो देखने, सुनने, सोचने और जानने की समस्त प्रक्रियाओं का साक्षी है, उसे अध्यात्म में द्रष्टा, साक्षी या चैतन्य कहा जाता है।
वह कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे आँखों से देखा जा सके, कानों से सुना जा सके या हाथों से छुआ जा सके।
क्योंकि वह स्वयं जानने का आधार है।
जो सबको प्रकाशित कर रहा है, उसे प्रकाशित करने के लिए किसी दूसरे प्रकाश की आवश्यकता कैसे हो सकती है?
यही इंद्रियातीत सत्ता का गहरा रहस्य है।
3. इंद्रियातीत सत्य को जानने का मार्ग: प्रत्यक्ष आत्मानुभूति
यदि इंद्रियाँ और मन-बुद्धि उस साक्षी चैतन्य को किसी बाहरी वस्तु की तरह नहीं जान सकते, तो फिर उसे जाना कैसे जाए?
इसका उत्तर है—आत्मानुसंधान और प्रत्यक्ष आत्मानुभूति।
जैसे बाहर की वस्तुओं को जानने के लिए हम अपनी इंद्रियों का उपयोग करते हैं, वैसे ही अपने वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए हमें अपनी दृष्टि को बाहरी विषयों से हटाकर स्वयं जानने वाले की ओर मोड़ना होगा।
जब आप बाहर के दृश्यों, वस्तुओं और संसार की निरंतर भागदौड़ से अपनी चित्तवृत्तियों को समेटकर अंतर्मुखी होते हैं…
जब आप अपने विचारों, भावनाओं और मानसिक गतिविधियों को भी देखने वाले साक्षी के प्रति सजग होते हैं…
जब आप यह प्रश्न करते हैं कि आखिर इन सबका अनुभव किसे हो रहा है?
तब आत्मविचार की यात्रा प्रारंभ होती है।
धीरे-धीरे यह समझ स्पष्ट होने लगती है कि शरीर, इंद्रियाँ, विचार और भावनाएँ सभी अनुभव के विषय हैं, जबकि इनके अनुभव का आधार साक्षी चैतन्य है।
यह कोई नई वस्तु प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं है। बल्कि अपने उस मूल स्वरूप को पहचानने की दिशा है, जो प्रत्येक अनुभव के पीछे सदैव उपस्थित है।
4. ज्ञान और अनुभव में अंतर
यहाँ एक बात समझना बहुत आवश्यक है।
किसी पुस्तक में आत्मा, ब्रह्म, चैतन्य या साक्षी के बारे में पढ़ लेना और वास्तव में अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष बोध होना—दो अलग-अलग बातें हैं।
आप हजारों बार पढ़ सकते हैं कि आप शरीर नहीं, बल्कि शरीर के साक्षी हैं।
आप अनेक आध्यात्मिक प्रवचन सुन सकते हैं और इस विषय पर घंटों चर्चा भी कर सकते हैं।
लेकिन जब तक यह सत्य आपके स्वयं के बोध का विषय नहीं बनता, तब तक यह केवल एक विचार या बौद्धिक धारणा ही बना रह सकता है।
शास्त्र, गुरु और विवेक हमें दिशा दिखा सकते हैं, लेकिन आत्मबोध की वास्तविकता को स्वयं जानना आवश्यक है।
सत्य को सुनना एक बात है, उसे समझना दूसरी और अपने वास्तविक स्वरूप के रूप में पहचानना उससे भी गहरी बात है।
5. अंतर्मुखी बनिए और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानिए
हमारा अधिकांश जीवन बाहर की वस्तुओं, संबंधों, इच्छाओं, उपलब्धियों और अनुभवों को जानने तथा प्राप्त करने में बीत जाता है।
हम संसार को जानने में इतने व्यस्त रहते हैं कि कभी-कभी यह प्रश्न करना ही भूल जाते हैं कि इस संसार को जान कौन रहा है?
जिस दिन यह प्रश्न वास्तव में हमारे भीतर उठने लगता है, उसी दिन आत्मबोध की यात्रा एक नई दिशा प्राप्त करती है।
इसलिए बाहरी संसार को जानने के साथ-साथ स्वयं जानने वाले को जानने का प्रयास भी कीजिए।
अपने भीतर उतरिए, आत्मविचार कीजिए और उस साक्षी चैतन्य के प्रति सजग होइए, जो आपके प्रत्येक अनुभव का आधार है।
क्योंकि परम सत्य कोई ऐसी बाहरी वस्तु नहीं है, जिसे इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त करना हो। आत्मज्ञान की दिशा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की दिशा है।
जिसे तुम खोज रहे हो, पहले यह जानने का प्रयास करो कि खोज कौन रहा है।
आपकी आत्मबोध की यात्रा मंगलमय हो!
— स्वयंप्रदीप
