शरीर के मोह से पार: क्या हमारी वास्तविक पहचान शरीर के नाम, रूप और आकार से परे भी है?

शरीर आत्मा का दार्शनिक व्याख्या

हम प्रतिदिन स्वयं को देखते हैं। दर्पण में अपना चेहरा पहचानते हैं, अपने शरीर को महसूस करते हैं, अपनी आवाज सुनते हैं और अपने विचारों तथा भावनाओं का अनुभव करते हैं। हमारा पूरा जीवन इसी शरीर और इसके माध्यम से प्राप्त होने वाले अनुभवों के साथ आगे बढ़ता है।

लेकिन कभी आपने एक क्षण रुककर यह प्रश्न किया है कि जिस शरीर को आप प्रतिदिन देखते और अनुभव करते हैं, क्या आपकी संपूर्ण पहचान केवल उतनी ही है?

क्या आपका होना केवल इस शरीर के नाम, रूप और आकार तक सीमित है? या इस दिखाई देने वाले शरीर और संसार के अनुभव के पीछे भी कुछ ऐसा है, जिसे अभी तक हमने ठीक से जानने का प्रयास ही नहीं किया?

आइए, किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दबाजी किए बिना, इस प्रश्न को थोड़ा गहराई से देखते हैं।

1. क्या हम स्वयं को केवल अपने शरीर से पहचानते हैं?

जब कोई आपसे पूछता है कि आप कौन हैं, तो आप अपना नाम बताते हैं। फिर अपनी पहचान, अपना परिवार, अपना काम और अपने शरीर से जुड़ी दूसरी जानकारियाँ बताते हैं।

लेकिन एक प्रश्न है।

क्या आपका नाम ही आप हैं? यदि आपका नाम बदल दिया जाए, तो क्या आप बदल जाएँगे?

यदि उम्र के साथ शरीर का आकार बदल जाए, चेहरे पर झुर्रियाँ आ जाएँ और शरीर की क्षमताएँ पहले जैसी न रहें, तो क्या आपका होना भी उसी अनुपात में बदल जाता है?

बचपन में आपका शरीर कुछ और था, आज कुछ और है। शरीर में निरंतर परिवर्तन हो रहा है। विचार बदल रहे हैं, पसंद-नापसंद बदल रही हैं और अनुभव भी बदल रहे हैं।

लेकिन इन सभी परिवर्तनों को जानने का अनुभव अभी भी आपके जीवन में उपस्थित है।

तो फिर विचार कीजिए—क्या हम अपने बदलते हुए रूप को ही अपना संपूर्ण स्वरूप मान बैठे हैं?

यहाँ शरीर को नकारने की बात नहीं है। शरीर हमारे वर्तमान जीवन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण माध्यम है। इसके बिना हम इस संसार के अनुभवों और व्यवहारों में भाग नहीं ले सकते।

लेकिन क्या किसी माध्यम को ही अपनी संपूर्ण पहचान मान लेना उचित होगा?

2. जो दिखाई दे रहा है, क्या सत्य केवल उतना ही है?

हमारी इंद्रियाँ हमें संसार से परिचित कराती हैं।

आँखें रंग और रूप दिखाती हैं, कान ध्वनियाँ सुनाते हैं, नाक सुगंध का अनुभव कराती है और त्वचा स्पर्श का बोध कराती है।

इन्हीं अनुभवों के माध्यम से हम अपने शरीर और संसार को जानते हैं।

लेकिन क्या कभी आपने ध्यान दिया है कि हम जो कुछ भी जानते हैं, वह हमारे अनुभव में किसी न किसी रूप में उपस्थित होता है?

कभी कोई दृश्य सामने होता है, कभी कोई आवाज सुनाई देती है, कभी कोई विचार उठता है और कभी कोई भावना अनुभव होती है।

इन सभी के आने-जाने के बीच एक प्रश्न लगातार बना रहता है—

इन सबका अनुभव किसे हो रहा है?

क्या आपने कभी इस प्रश्न को बिना कोई उत्तर पहले से तय किए अपने भीतर उठने दिया है?

हमारा ध्यान सामान्यतः अनुभव की वस्तुओं पर रहता है। हम क्या देख रहे हैं, क्या सुन रहे हैं, क्या सोच रहे हैं और क्या महसूस कर रहे हैं—इन्हीं में उलझे रहते हैं।

लेकिन क्या हमने कभी अनुभव की वस्तुओं से थोड़ा हटकर अनुभव करने वाले की ओर ध्यान दिया है?

शायद यहीं से अपने वास्तविक स्वरूप की खोज प्रारंभ हो सकती है।

3. शरीर और शरीर को जानने वाले के बीच क्या अंतर है?

एक छोटा-सा प्रयोग करके देखिए।

अपने हाथ को सामने रखिए और उसकी ओर देखिए।

अब अपनी आँखों को बंद करके हाथ के स्पर्श, उसकी स्थिति और उससे उत्पन्न होने वाली संवेदना पर ध्यान दीजिए।

आपको पता है कि आपका हाथ कहाँ है। आपको यह भी पता है कि उसमें कोई संवेदना हो रही है या नहीं।

अब प्रश्न कीजिए—इस हाथ की स्थिति और संवेदना को जान कौन रहा है?

इसी प्रकार, जब मन में कोई विचार उठता है, तो क्या आपको उस विचार का पता चलता है?

जब मन प्रसन्न होता है, तब क्या आपको प्रसन्नता का बोध होता है? और जब मन उदास होता है, तब क्या आप उस उदासी को भी जान पाते हैं?

यदि शरीर, विचार और भावनाएँ आपके अनुभव में आ रही हैं, तो क्या इनके अनुभव और इनके जानने वाले के बीच कोई अंतर है?

अध्यात्म में इसी जानने वाले को द्रष्टा, साक्षी या चैतन्य जैसे नाम दिए गए हैं।

लेकिन क्या केवल इन नामों को जान लेना पर्याप्त है?

क्या इसे अपने वर्तमान अनुभव में समझने का कोई मार्ग नहीं होना चाहिए?

4. अशरीरी होने का अर्थ क्या है?

यहाँ एक बहुत रोचक प्रश्न सामने आता है।

जब हम कहते हैं कि हमारी वास्तविक पहचान शरीर से परे है, तो इसका अर्थ आखिर क्या है?

क्या इसका अर्थ यह है कि हमारे भीतर कोई दूसरी सूक्ष्म आकृति बैठी हुई है?

क्या वह शरीर के किसी विशेष हिस्से में मौजूद है?

या हम ‘शरीर से परे’ कहकर भी अनजाने में उसी शरीर के आधार पर किसी दूसरे अस्तित्व की कल्पना कर रहे हैं?

जरा विचार कीजिए।

शरीर का एक निश्चित आकार है। उसका भार है, उसकी सीमाएँ हैं और वह स्थान घेरता है। लेकिन जिस चैतन्य में शरीर का अनुभव हो रहा है, क्या उसे भी उसी प्रकार किसी आकार और स्थान में बाँधा जा सकता है?

क्या जानने वाले को भी जानने योग्य वस्तुओं की श्रेणी में रख सकते हैं?

यही वह प्रश्न है, जहाँ ‘अशरीरी’ शब्द का वास्तविक आशय समझने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है।

अशरीरी होने का अर्थ शरीर से भाग जाना, शरीर का विरोध करना या शरीर को असत्य घोषित करना नहीं है।

बल्कि यह जाँच करना है कि क्या हमारा वास्तविक होना शरीर के नाम, रूप और आकार से पूरी तरह निर्धारित होता है?

क्या शरीर हमारे अस्तित्व का एक अनुभवात्मक आयाम है, या हमारा अस्तित्व केवल शरीर तक ही सीमित है?

इस प्रश्न को अपने भीतर खुला रहने दीजिए।

5. क्या हम शरीर के साथ अपने तादात्म्य को पहचान सकते हैं?

मान लीजिए, कोई व्यक्ति बाइक चला रहा है।

वह बाइक का उपयोग कर रहा है। बाइक के माध्यम से यात्रा कर रहा है और उसकी देखभाल भी कर रहा है।

अब यदि वह अपनी पहचान को ही बाइक तक सीमित कर दे, तो क्या वह अपनी व्यापक पहचान को भूल नहीं जाएगा?

इसी उदाहरण से एक प्रश्न हमारे सामने आता है।

हम इस शरीर के माध्यम से देखते हैं, चलते हैं, बोलते हैं, अनुभव करते हैं और संसार के साथ संबंध बनाते हैं।

तो क्या कभी हमने इस माध्यम के साथ इतना गहरा तादात्म्य बना लिया है कि इसे ही अपना संपूर्ण अस्तित्व मानने लगे हैं?

हम कहते हैं—मेरा शरीर, मेरा हाथ, मेरा मन, मेरे विचार और मेरी भावनाएँ।

लेकिन यहाँ एक और प्रश्न उठता है।

जिसे हम ‘मेरा’ कह रहे हैं, उस ‘मैं’ की वास्तविक पहचान क्या है?

क्या इस प्रश्न का उत्तर केवल शब्दों में मिल सकता है?

या इसके लिए अपने अनुभव को थोड़ा अधिक ध्यानपूर्वक देखना होगा?

6. क्या अंतर्दृष्टि हमें अपनी पहचान के किसी नए आयाम से परिचित करा सकती है?

हमारी दृष्टि अधिकांश समय बाहर की ओर रहती है।

हम संसार को देखते हैं, वस्तुओं को पहचानते हैं, संबंधों को निभाते हैं और अपने जीवन की परिस्थितियों के अनुसार कार्य करते हैं।

यह सब आवश्यक भी है। संसार से विमुख होना या वर्तमान जीवन की उपेक्षा करना आत्मज्ञान का उद्देश्य नहीं हो सकता।

लेकिन क्या बाहरी संसार के अनुभवों के साथ-साथ हम अपने अनुभव करने की प्रक्रिया को भी देख सकते हैं?

जब आप किसी फूल को देखते हैं, तो केवल फूल को देखने में ही व्यस्त रहते हैं या इस बात के प्रति भी सजग हो सकते हैं कि फूल का दृश्य आपके अनुभव में उपस्थित हो रहा है?

जब आप किसी की बात सुनते हैं, तो केवल शब्दों पर ध्यान देते हैं या सुनने के इस अनुभव के प्रति भी सजग हो सकते हैं?

जब मन में कोई विचार उठता है, तो क्या आप उस विचार के साथ बह जाते हैं या उसे उठते हुए भी देख सकते हैं?

यही अंतर्दृष्टि की शुरुआत हो सकती है।

अंतर्दृष्टि का अर्थ किसी काल्पनिक दुनिया में प्रवेश करना नहीं है। इसका अर्थ है अपने वर्तमान अनुभव को अधिक सजगता और गहराई से देखना।

और क्या पता, इसी सजगता में हमें अपने होने के उस आयाम की झलक मिले, जिसे अब तक हमने अपने शरीर, विचारों और बाहरी पहचान के पीछे कभी ठीक से देखा ही नहीं।

7. बस, एक प्रश्न के साथ ठहरकर देखिए!

अब तक हम अपने शरीर, विचारों, भावनाओं और संसार के अनेक अनुभवों के बारे में बात कर चुके हैं।

लेकिन एक प्रश्न अभी भी हमारे सामने है—

वह कौन है, जिसके लिए ये सभी अनुभव घटित हो रहे हैं?

क्या वह भी कोई अनुभव की वस्तु है?

यदि वह वस्तु नहीं है, तो उसे जानने का हमारा सामान्य तरीका क्या पर्याप्त होगा?

क्या उसे किसी नाम, रूप, आकार या परिभाषा में बाँधा जा सकता है?

और यदि नहीं, तो क्या उसे जानने की दिशा में पहला कदम किसी नए ज्ञान को प्राप्त करना है, या अपनी वर्तमान पहचान से जुड़े प्रश्नों को ईमानदारी से देखना है?

अद्वैत वेदांत इसी खोज को आत्मविचार की दिशा देता है। उसमें आत्मा को नित्य, अजन्मा और अमर स्वरूप कहा गया है।

लेकिन क्या इन शब्दों को केवल पढ़ लेना ही पर्याप्त है?

क्या अमरता का विचार जान लेना और अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होना एक ही बात है?

शायद हमें किसी निष्कर्ष को तुरंत स्वीकार करने के बजाय इस प्रश्न के साथ स्वयं को थोड़ा समय देना चाहिए।

अपने शरीर की उपेक्षा मत कीजिए, संसार के अनुभवों को नकारिए मत और वर्तमान जीवन से भागिए भी मत।

बस, जो कुछ अभी आपके अनुभव में है, उसे अधिक सजगता से देखिए।

क्या पता, जिस सत्य को हम कहीं बाहर खोजते रहे हैं, उसकी खोज का आरंभ इसी क्षण, इसी वर्तमान अनुभव को समझने से होता हो!

— स्वयंप्रदीप