एक वर्ष में 365 दिन होते हैं।
365 दिन, जिनमें हम काम करते हैं, कमाते हैं, जिम्मेदारियाँ निभाते हैं, रिश्ते सँभालते हैं, दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करते हैं और न जाने कितनी चीजों के पीछे भागते रहते हैं।
लेकिन आज आपसे एक छोटा-सा प्रश्न है।
क्या आप 365 दिनों में से केवल 65 दिन अपने लिए नहीं निकाल सकते?
न अपने परिवार के लिए, न अपने मित्रों के लिए, न अपने कार्यालय के लिए, न अपने व्यवसाय के लिए और न ही किसी दूसरे की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए।
केवल अपने लिए!
यदि आप ऐसा भी नहीं कर सकते, तो शायद आप वास्तव में गरीब हैं।
यह गरीबी पैसों की नहीं है। यह अपने समय, अपने अस्तित्व और अपने जीवन के प्रति जागरूकता की गरीबी है।
आप सबके लिए समय निकालते हैं, बस अपने लिए नहीं!
जरा अपने दैनिक जीवन पर नजर डालिए।
सुबह उठते हैं क्योंकि काम पर जाना है।
काम करते हैं क्योंकि जिम्मेदारी है।
कमाते हैं क्योंकि आवश्यकताएँ हैं।
दूसरों की सहायता करते हैं क्योंकि उन्हें आपकी जरूरत है।
रिश्ते निभाते हैं क्योंकि वे महत्वपूर्ण हैं।
किसी की अपेक्षा पूरी करते हैं, किसी की शिकायत सुनते हैं और किसी की समस्या सुलझाते हैं।
इस तरह एक दिन समाप्त हो जाता है।
फिर दूसरा दिन आता है और फिर वही क्रम शुरू हो जाता है।
धीरे-धीरे दिन सप्ताह में, सप्ताह महीनों में और महीने वर्षों में बदल जाते हैं।
लेकिन इस पूरी यात्रा में एक व्यक्ति लगातार उपेक्षित रह जाता है।
वह व्यक्ति आप स्वयं हैं!
कभी आपने सोचा है कि आखिरी बार आपने अपने लिए कुछ कब किया था?
कब आपने शांति से बैठकर स्वयं को समझने का प्रयास किया था?
कब आपने कोई पुस्तक केवल इसलिए पढ़ी थी क्योंकि आप पढ़ना चाहते थे?
कब आपने अपने स्वास्थ्य, अपने सपनों, अपनी रुचियों और अपनी खुशियों को प्राथमिकता दी थी?
शायद आप दूसरों के जीवन में अपनी भूमिका निभाते-निभाते अपने ही जीवन में स्वयं की भूमिका भूल गए हैं।
365 में से 65 दिन का अर्थ क्या है?
आइए, इस विचार को गणित से समझते हैं।
एक वर्ष = 365 दिन।
आपके अपने लिए = 65 दिन।
अर्थात वर्ष के लगभग 18 प्रतिशत दिन!
आप अपने जीवन का पाँचवाँ हिस्सा भी अपने लिए नहीं निकाल रहे हैं। आप तो उससे भी कम समय की बात कर रहे हैं।
और इन 65 दिनों को लगातार एक साथ बिताना भी आवश्यक नहीं है।
आप इन्हें पूरे वर्ष में अपनी सुविधानुसार बाँट सकते हैं।
इन दिनों में आप क्या कर सकते हैं?
- कोई नई भाषा या कौशल सीख सकते हैं।
- अच्छी पुस्तकें पढ़ सकते हैं।
- अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दे सकते हैं।
- प्रकृति के साथ समय बिता सकते हैं।
- अपनी रुचियों और रचनात्मक क्षमताओं को विकसित कर सकते हैं।
- किसी पुराने सपने को पूरा करने की दिशा में काम कर सकते हैं।
- यात्रा कर सकते हैं और नई जगहों को जान सकते हैं।
- स्वयं के विचारों, व्यवहार और निर्णयों का विश्लेषण कर सकते हैं।
- मोबाइल और सोशल मीडिया से दूर रहकर स्वयं के साथ समय बिता सकते हैं।
- जीवन में वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है, इसे समझ सकते हैं।
ये दिन बर्बाद किए हुए दिन नहीं होंगे।
ये उस व्यक्ति में किया गया निवेश होंगे, जिसे शेष 300 दिन भी जीने हैं।
सबके लिए उपलब्ध रहना और स्वयं के लिए जीना अलग-अलग बातें हैं
हमारे जीवन की एक अजीब आदत बन गई है।
जब कोई दूसरा व्यक्ति हमारा समय माँगता है, तो हम अपनी दिनचर्या बदल लेते हैं।
लेकिन जब हमारा शरीर आराम माँगता है, तो हम उसे टाल देते हैं।
जब मन शांति चाहता है, तो हम उसे मोबाइल थमा देते हैं।
जब कोई सपना ध्यान माँगता है, तो हम कहते हैं कि अभी समय नहीं है।
हम दूसरों को निराश नहीं करना चाहते, लेकिन स्वयं को निराश करते रहने में हमें कोई परेशानी नहीं होती।
किसी दूसरे को मना करने में हमें अपराधबोध होता है, लेकिन अपने सपनों को बार-बार मना करने में नहीं।
जरा सोचिए!
क्या आपकी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है?
आपका स्वास्थ्य आपकी जिम्मेदारी है।
आपका ज्ञान आपकी जिम्मेदारी है।
आपकी मानसिक शांति आपकी जिम्मेदारी है।
आपकी प्रतिभा और आपके सपने भी आपकी जिम्मेदारी हैं।
आपका जीवन केवल दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करने के लिए नहीं है।
आप भी इस जीवन के एक महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं।
अपने लिए समय निकालना स्वार्थ नहीं है
कई लोगों को लग सकता है कि अपने लिए 65 दिन निकालना स्वार्थ है।
लेकिन क्या स्वस्थ रहना स्वार्थ है?
क्या ज्ञान प्राप्त करना स्वार्थ है?
क्या स्वयं को समझना स्वार्थ है?
क्या अपनी क्षमताओं को विकसित करना स्वार्थ है?
क्या अपने सपनों को पूरा करने का प्रयास करना स्वार्थ है?
नहीं!
दूसरों के लिए जीना अच्छी बात है, लेकिन दूसरों के लिए जीते हुए स्वयं को भूल जाना अच्छी बात नहीं है।
आप अपने परिवार से प्रेम कर सकते हैं और साथ ही अपने सपनों को भी महत्व दे सकते हैं।
आप अपनी जिम्मेदारियाँ निभा सकते हैं और फिर भी अपने लिए समय निकाल सकते हैं।
आप दूसरों की सहायता कर सकते हैं और फिर भी अपनी सीमाएँ निर्धारित कर सकते हैं।
अपने लिए समय निकालने का अर्थ दूसरों से दूर भागना नहीं है।
इसका अर्थ है स्वयं से दूर न भागना।
यदि आप इन 65 दिनों का सही उपयोग करें तो?
कल्पना कीजिए कि आपके जीवन के दो रूप हैं।
पहले रूप में आप हर वर्ष लगभग वही जीवन जीते हैं। वही दिनचर्या, वही व्यस्तता, वही शिकायतें, वही बहाने और वही अधूरे सपने।
दूसरे रूप में आप प्रत्येक वर्ष अपने लिए 65 दिन निकालते हैं।
इन दिनों में आप स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं।
कुछ नया सीखते हैं, स्वास्थ्य सुधारते हैं, अपनी रुचियों को विकसित करते हैं, अपने विचारों को समझते हैं और अपनी क्षमताओं को पहचानते हैं।
अब सोचिए, पाँच वर्ष बाद इन दोनों रूपों में क्या अंतर हो सकता है?
संभव है कि दूसरे रूप में आप अधिक जागरूक, अधिक आत्मविश्वासी, अधिक स्वस्थ और अधिक सक्षम व्यक्ति बन जाएँ।
यह आवश्यक नहीं कि 65 दिन आपके जीवन की प्रत्येक समस्या समाप्त कर दें।
यह भी आवश्यक नहीं कि इन दिनों में किया गया प्रत्येक प्रयास आपको सफलता दिला दे।
लेकिन इतना अवश्य संभव है कि आप अपने जीवन की दिशा बदलने की शुरुआत कर दें।
क्योंकि परिवर्तन हमेशा बड़े कदमों से नहीं आता। कभी-कभी वह स्वयं को दिए गए छोटे-से समय से शुरू होता है।
आपका जीवन केवल जिम्मेदारियों की सूची नहीं है
कल्पना कीजिए कि एक दिन आप पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखते हैं।
आपने एक अच्छे कर्मचारी की भूमिका निभाई।
एक जिम्मेदार माता-पिता बने।
एक अच्छे मित्र बने।
एक सहयोगी व्यक्ति बने।
परिवार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाईं।
लेकिन क्या आपने कभी उस व्यक्ति को जानने का प्रयास किया, जो इन सभी पहचानों के पीछे मौजूद था?
आपकी अपनी पसंद क्या थी?
आप क्या सीखना चाहते थे?
किस चीज में आपकी रुचि थी?
किस काम से आपको वास्तविक आनंद मिलता था?
बचपन में आपने क्या बनने का सपना देखा था?
क्या आपने कभी अपने अस्तित्व को केवल पद, पैसा, संबंध और जिम्मेदारियों से अलग करके देखने का प्रयास किया?
आप केवल किसी के कर्मचारी, माता-पिता, मित्र, जीवनसाथी या रिश्तेदार नहीं हैं।
इन सभी पहचानों से परे भी आपका एक अस्तित्व है।
उस अस्तित्व को जानने और अनुभव करने का अधिकार भी आपको है।
अपने जीवन को केवल कर्तव्यों की एक लंबी सूची मत बनने दीजिए।
उसमें खोज, अनुभव, आनंद और आत्मचिंतन के लिए भी स्थान रखिए।
एक छोटा-सा संकल्प : अपने लिए 65 दिन
किसी आदर्श समय, अनुकूल परिस्थिति या विशेष अवसर की प्रतीक्षा मत कीजिए।
आज से ही अपने लिए 65 दिनों का संकल्प लीजिए।
इन्हें पूरे वर्ष में बाँट लीजिए।
कुछ दिन स्वास्थ्य के लिए रखिए।
कुछ दिन ज्ञान और अध्ययन के लिए।
कुछ दिन अपनी रुचियों और रचनात्मकता के लिए।
कुछ दिन यात्रा और नए अनुभवों के लिए।
कुछ दिन मौन, शांति और आत्मचिंतन के लिए।
और कुछ दिन ऐसे भी रखिए, जब आपको कुछ भी उत्पादक करने की आवश्यकता न हो।
बस अपने साथ रहिए।
बिना किसी अपराधबोध के आराम कीजिए।
याद रखिए, जीवन का उद्देश्य केवल अधिक काम करना और अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त करना नहीं है।
जीवन का उद्देश्य उसे समझना, अनुभव करना और सार्थक बनाना भी है।
इन 65 दिनों को व्यस्त मत बनाइए, इन्हें अर्थपूर्ण बनाइए।
अंत में : स्वयं से एक प्रश्न
एक वर्ष आपको 365 दिन देता है।
आप अपना समय काम, पैसा, रिश्तों, जिम्मेदारियों, अपेक्षाओं और न जाने कितनी चीजों को देते हैं।
लेकिन क्या आप उस व्यक्ति को केवल 65 दिन भी नहीं दे सकते, जो यह सब अनुभव कर रहा है?
यदि आप 365 दिनों में से अपने विकास, स्वास्थ्य, आनंद और अस्तित्व के लिए 65 दिन भी नहीं निकाल सकते, तो संभव है कि आपकी सबसे बड़ी गरीबी पैसों की नहीं, बल्कि स्वयं से आपके संबंध की है।
अपना पूरा जीवन सबके लिए सब कुछ बनने में मत गुजार दीजिए, जबकि स्वयं के लिए आपके पास कुछ भी न बचे।
आप अपने समय के अधिकारी हैं।
आप अपने सपनों के अधिकारी हैं।
आप स्वयं को जानने के अधिकारी हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण बात, आप अपने जीवन को वास्तव में जीने के अधिकारी हैं।
365 दिन एक वर्ष के होते हैं, लेकिन उन 365 दिनों को जीना आपको है।
इसलिए अपने जीवन में सबके लिए स्थान रखिए, लेकिन स्वयं को कभी उस जीवन से बाहर मत कीजिए।
आपका हमसफर : स्वयंप्रदीप
