About Author

प्रदीप थवाईत

मैं प्रदीप थवाईत हूँ—एक जिज्ञासु, मार्ग-खोजी यात्री।

मैं उस मार्ग की खोज में हूँ, जो आनंद की ओर ले जाए;
उस मार्ग की खोज में हूँ, जो मनुष्य को स्वयं की प्रकृति को समझने की ओर ले जाए।

Pradeep Thawait – Author of Svayampradeep.com
Pradeep Thawait, author of Svayampradeep.com

कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर केवल सुन लेने से नहीं मिलता। वे मनुष्य को भीतर तक ले जाते हैं और बार-बार पूछने के लिए मजबूर करते हैं—

सत्य क्या है?
मनुष्य दुःखी क्यों है?
आनंद क्या है?
मनुष्य के जीवन का प्रयोजन क्या है?
जिसे हम सत्य मानते हैं, क्या वह वास्तव में सत्य है?
और क्या हम स्वयं को उतना जानते हैं, जितना हम समझते हैं?

इन्हीं प्रश्नों से Svayampradeep की शुरुआत हुई।

Svayampradeep का उद्देश्य

Svayampradeep का मुख्य प्रयास है—

मनुष्य की दुःख-निवृत्ति से आनंद-प्राप्ति तक की यात्रा को समझना।

जीवन बहुत छोटा है। इसलिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि हम अपना समय कहाँ लगा रहे हैं।

क्या हम अपना जीवन केवल उन बातों को मानने में लगा दें जिन्हें हमने दूसरों से सुना है?

या कभी रुककर यह भी पूछें—

“यह सत्य क्यों है?”

मेरे लिए विचार करने का अर्थ केवल दूसरों के विचारों को स्वीकार या अस्वीकार करना नहीं है।

विचार करने का अर्थ है—

प्रश्न करना।
जाँचना।
अनुभव करना।
समझने का प्रयास करना।
और आवश्यकता पड़े तो अपनी ही मान्यता पर प्रश्न उठाना।

सुनी-सुनाई बातों से आगे

मनुष्य जन्म से ही अनेक धारणाओं के बीच बड़ा होता है।

परिवार कुछ बताता है।

समाज कुछ बताता है।

परंपरा कुछ बताती है।

पुस्तकें कुछ बताती हैं।

और समय के साथ इन सबके बीच हमारी अपनी मान्यताएँ बन जाती हैं।

लेकिन क्या जो हमें बताया गया है, वही सत्य है?

शायद यह प्रश्न पूछना ही सत्य की खोज की शुरुआत है।

Svayampradeep पर मेरा प्रयास किसी विचार को केवल इसलिए स्वीकार करना नहीं होगा कि वह बहुत पुराना है, बहुत प्रसिद्ध है या बहुत लोगों द्वारा माना जाता है।

और किसी विचार को केवल इसलिए अस्वीकार करना भी नहीं कि वह हमारी वर्तमान धारणा से अलग है।

पहले उसे समझना है।

फिर प्रश्न करना है।

और जहाँ तक संभव हो, सत्य के निकट जाने का प्रयास करना है।

भगवान हैं या नहीं?

यह भी मनुष्य के सबसे पुराने प्रश्नों में से एक है।

लेकिन Svayampradeep का मुख्य उद्देश्य केवल इस बहस में उलझना नहीं है कि—

“भगवान हैं या नहीं?”

क्योंकि उससे पहले भी एक प्रश्न मौजूद है—

“यदि मेरा जीवन है, तो इसका प्रयोजन क्या है?”

यदि कोई व्यक्ति ईश्वर में विश्वास करता है, तब भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण है।

यदि कोई व्यक्ति ईश्वर में विश्वास नहीं करता, तब भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण है।

इसलिए Svayampradeep की दृष्टि आस्तिकता और नास्तिकता के बीच किसी एक पक्ष को चुनने से अधिक, उनके पार जाकर जीवन के मूल प्रश्नों को देखने की कोशिश है।

प्रश्न यह नहीं कि आप किस पक्ष में हैं।

प्रश्न यह है कि—

आपने जो माना है, उसे कितनी गहराई से समझा है?

प्रकृति के साथ

मनुष्य प्रकृति से अलग कोई स्वतंत्र संसार नहीं है।

हमारा शरीर, हमारा भोजन, हमारी साँस, हमारा जीवन और हमारा अस्तित्व—किसी न किसी रूप में प्रकृति से जुड़े हैं।

इसलिए Svayampradeep की दृष्टि में प्रकृति केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि समझने योग्य वास्तविकता है।

प्रकृति को समझना स्वयं को समझने की यात्रा का भी एक हिस्सा हो सकता है।

आनंदो ब्रह्मेति व्यजानात्

Svayampradeep का tagline है—

“आनंदो ब्रह्मेति व्यजानात्”

आनंद यहाँ केवल क्षणिक सुख या मनोरंजन के अर्थ में नहीं है।

मनुष्य जीवन में सुख खोजता है।

दुःख से बचना चाहता है।

शांति चाहता है।

संतोष चाहता है।

और अंततः आनंद की खोज करता है।

इसलिए Svayampradeep में दुःख और आनंद दो अलग-अलग विषय नहीं होंगे।

दुःख को समझे बिना आनंद की खोज अधूरी हो सकती है।

और आनंद को समझे बिना दुःख से मुक्ति का प्रयोजन भी अधूरा रह सकता है।

यात्रा इसलिए केवल यह नहीं है कि—

“दुःख क्यों है?”

बल्कि यह भी है—

“दुःख से आगे क्या है?”

मैं स्वयं भी एक खोजी हूँ

मैं स्वयं को अंतिम सत्य का ज्ञाता नहीं मानता।

मैं भी प्रश्न कर रहा हूँ।

मैं भी सीख रहा हूँ।

मैं भी अपनी धारणाओं को देखने और समझने का प्रयास कर रहा हूँ।

इसलिए Svayampradeep पर लिखे विचारों को किसी अंतिम आदेश या अंतिम सत्य की तरह पढ़ने के बजाय एक सतत खोज में रखे गए विचारों की तरह पढ़ना अधिक उचित होगा।

आप सहमत हो सकते हैं।

असहमत हो सकते हैं।

प्रश्न कर सकते हैं।

किसी विचार को आगे बढ़ा सकते हैं।

और संभव है कि किसी लेख से आपको अपने जीवन का कोई नया प्रश्न मिल जाए।

मेरे लिए यह भी एक उपलब्धि होगी।

क्योंकि शायद दर्शन का उद्देश्य हर प्रश्न को तुरंत समाप्त कर देना नहीं है।

कभी-कभी एक सही प्रश्न मनुष्य को उस उत्तर से कहीं आगे ले जाता है जिसे उसने बिना सोचे स्वीकार कर लिया था।

Svayampradeep

Svayampradeep मेरे लिए केवल एक website नहीं है।

यह उन प्रश्नों को शब्द देने का प्रयास है जो भीतर उठते हैं।

सत्य की खोज से लेकर दुःख की निवृत्ति तक।
दुःख की निवृत्ति से आनंद की ओर।
सुनी-सुनाई बातों से विचार की ओर।
अंधविश्वास से प्रश्न की ओर।
आस्तिकता और नास्तिकता की सीमाओं से आगे प्रयोजन की ओर।
और अंततः—दूसरों द्वारा बताए गए “स्वयं” से अपने वास्तविक “स्वयं” की ओर।

शायद यही यात्रा है।

और शायद यह यात्रा केवल मेरी नहीं है।

हम सभी किसी न किसी रूप में स्वयं को खोज रहे हैं।

— प्रदीप थवाईत

Svayampradeep
आनंदो ब्रह्मेति व्यजानात्