मेरा कौन ?

मैं कौन मेरा कौन ? — शरीर, मन, परिवार और संपत्ति पर दार्शनिक चिंतन

जान जाओगे तो जाग जाओगे !

जी हाँ, यदि आप जान गए “मैं कौन?” और दूसरा “मेरा कौन?”, तो आप अपना शेष जीवन जाग्रत अवस्था में जी सकते हैं। आप आशा और निराशा से आगे निकलकर आनंदपूर्वक जीवन जी सकते हैं।

हमने हमारे पिछले लेख “मैं कौन?” में खूब सारी ऐसी चीजें गिनवाई थीं, जिन्हें मेरा कहा जाता है :

मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा परिवार, मेरे मित्र, मेरा घर, मेरा शरीर………आदि आदि। बहुत-सी चीजें हैं जिन्हें हम “मेरा” कहते हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या सच में ये सब मेरा है? या ऐसे ही बस कहे जा रहे हैं?

मैं “मेरा” किसे कहूँ? जिस पर मेरा पूर्ण अधिकार, नियंत्रण और शासन हो? या फिर उसे, जिस पर कुछ सीमा तक मेरा अधिकार हो?

चलो, अब एक-एक करके इस पर विचार करते हैं।

1. अधिकार

मेरे शरीर पर मेरा अधिकार जन्म से मृत्यु तक है। मेरे मन पर तो पूरा-पूरा अधिकार कभी नहीं रहा, कभी भी धोखा दे देता है। 😄

मेरा घर, परिवार, अन्य रिश्तेदार और मित्रों पर कितना अधिकार है, ये किससे छुपा हुआ है?

तो अधिकार तो है नहीं, लगता है किसी पर, तो कैसे कहें कि ये मेरा है?

एक और बात—अधिकार तो ताकत के दम पर जबरदस्ती भी किया जाता है, तो क्या ऐसा वाला भी मेरा हो सकता है?

मुझे तो नहीं लगता। आप अपने बुद्धि और विवेकपूर्वक विचार कीजिए।

2. नियंत्रण

अब अगर नियंत्रण की बात करें तो यह भी सबका अपना अनुभव है कि कुछ खास नियंत्रण कहीं भी तो नहीं हमारा।

न शरीर पर, न परिवार पर, न समाज पर और न ही मन पर।

अरे, मन को तो अलग ही रखो। इस पर नियंत्रण हो, इसीलिए तो इतने बखेड़े हैं। 😄

तो इसके हिसाब से भी कुछ बात बनती हुई नजर नहीं आती।

3. शासन

अब अगर इसकी बात करें तो यह तो और भी कठिन है, क्योंकि जिस पर न अधिकार ही है और न ही नियंत्रण, फिर शासन कैसे ही किया जा सकता है?

तो यहाँ भी समस्या ही है।

अब प्रश्न यह है :

क्या अधिकार, नियंत्रण और शासन का होना आवश्यक और पर्याप्त मापदंड हो सकते हैं किसी को “मेरा” कहने के लिए?

अब जब मापदंड पर ही सवाल उठे, तो सावधान हो जाना चाहिए। यहाँ गहराई में, तह तक जाने की आवश्यकता होगी।

इन पर सवाल इसलिए जरूरी हैं क्योंकि यदि किसी तरह ये तीनों प्राप्त हो भी जाएँ, तो टिकते नहीं।

न अधिकार, न नियंत्रण और ना ही शासन।

ये तो आज हैं और कल गए।

फिर परसों किसे कहूँ मैं अपना, मेरा?

तो आपने कथाओं एवं सत्संग में सुना होगा—आपका वो होगा जो शाश्वत है, नश्वर नहीं।

जी हाँ, हम जब किसी पसंदीदा चीज, जिससे आनंद की प्राप्ति हो, चाहते हैं तो अनंत समय के लिए चाहते हैं।

तो जब मैं “मेरा” कहना चाहूँगा किसी को, तो वो समय की सीमा से बंधा हुआ नहीं होना चाहिए।

अरे, जो मेरा है उसे समय (काल = Time) कैसे छीन सकता है मुझसे?

और समय ही क्यों?

कोई भी कैसे छीन सकता है उसे, जो मेरा है?

अब मैं यहाँ अपने विचार रखना चाहता हूँ, आप सावधान रहें, मेरे विचार आपको प्रभावित न करें।

मेरे विचार से जो मेरा है, उसे मुझसे कोई नहीं छीन सकता।

कोई भी नहीं। कोई भी नहीं मतलब कोई भी नहीं।

अब मुझे तो ऐसा अब तक कुछ नहीं अनुभव हुआ, जो मुझसे छिना न जा सके।

कम से कम समय तो सब छीन लेगा—

घर, परिवार, मित्र, दुश्मन, रिश्तेदार, शरीर और सारे अंग, मन, बुद्धि आदि।

फिर सावधान हो जाइए— मेरे विचार प्रभावित न करें आपको।

हाँ, शायद मेरा अस्तित्व बचा रहेगा। और मेरा अस्तित्व तो मैं ही हुआ। “तो सच्चा मेरा मैं ही हुआ।” मेरा अस्तित्व मेरा सत्य है और मेरा सत्य कौन छिनेगा मुझसे?

सत्यमेव जयते ! सत्यं परमं धीमहि। सत्यम् शिवम् सुन्दरम्।

तो सत्य ही मेरा है !

अब यदि मैं ही मेरा हूँ तो “स्वार्थ” पर विचार करते हैं।

स्वार्थ का सही अर्थ क्या है? स्वार्थ सही या गलत?

स्वार्थ, लालसा (लालच) और भय (डर) बहुत बदनाम शब्दों में से हैं। 😄

स्वार्थ = स्व + अर्थ

मतलब, स्वार्थ का अर्थ ही होता है अपने को जानना, अर्थात “मैं” को जानना।

बोले तो—

“मैं कौन?” यह जानने वाला स्वार्थी होता है।

भाई, मैं तो कहता हूँ—(सावधान! ये मेरे विचार हैं )

सबको स्वार्थी होना चाहिए।

सबको आत्मज्ञान होना चाहिए।

सबको पता होना चाहिए—

“मैं कौन?”

हाँ, दैनिक जीवन में जब हम किसी को स्वार्थी कहते हैं, तो उसका एक बहु-प्रचलित अर्थ निकाल रहे होते हैं—

अपने ही अर्थ की सिद्धि करने वाला, अर्थात केवल अपने ही फायदे के बारे में सोचने वाला।

सामाजिक व्यवस्था के लिए इस वाले अर्थ में स्वार्थी होना सही नहीं है, क्योंकि इससे समाज में अव्यवस्था और अराजकता बढ़ सकती है।

लेकिन यहाँ एक बार फिर सवाल उठता है—

क्या “स्वार्थ” वास्तव में गलत है, या हमने उसके एक अर्थ को गलत समझकर पूरे शब्द को ही बदनाम कर दिया है?

एक अर्थ में स्वार्थ शायद अपने फायदे के लिए दूसरों की उपेक्षा करना है।

लेकिन दूसरे अर्थ में—

स्वार्थ शायद स्वयं को जानने की शुरुआत है।

तो फिर विचार करने वाली बात यह है कि—

क्या स्वयं को जानने वाला व्यक्ति स्वार्थी है?

और यदि है, तो ऐसा स्वार्थ गलत क्यों हो?

शायद हमें “स्वार्थ” को भी उसी तरह देखना होगा जैसे हमने “मेरा” को देखा था—

बिना तुरंत सही या गलत का निर्णय किए।

क्योंकि हो सकता है जिस शब्द को हम जीवनभर गलत समझते रहे, उसके भीतर भी कोई दूसरा अर्थ छिपा हो।

तो मित्रों,

“मैं कौन?” — “मेरा कौन?”

ये दोनों प्रश्न आपके अपने अनुभव और खोज के विषय हैं।

इस खोज-यात्रा में मैं आपका हमसफ़र—

स्वयंप्रदीप!

धन्यवाद!